विदेशी दासता की ओर बढ़ते कदम
हमारी शिक्षा विदेशी, संस्कार विदेशी, वेशभूषा-भाषा विदेशी, खेल मनोरंजन के साधन विदेशी, चिकित्सा विदेशी, प्राय: सभी कानून व प्रशासनिक ढांचा विदेशी, मानसिकता विदेशी, खानपान विदेशी, हमारी राष्ट्रीय सम्पत्ति के अधिकांश लुटेरे ग्राहक विदेशी, विज्ञान व तकनीक विदेशी तथा संसार में एक मात्र देश, जिसका नाम भी विदेशी तथा जो अपने ही इतिहास व संस्कृति पर प्रहार करता है। विदेशी निवेश, अनुदान व ऋण पर निर्भरता, अब तो रोग भी विदेशी, अंतरराष्ट्रीयकरण वा आधुनिकता के नाम पर प्रभावशाली राष्ट्रों की खुली दासता को स्वीकार करने की होड़ में अग्रणी रहने का प्रयास।
यह विदेशी दासता आज सभी प्रबुद्धों, राजनैतिक दलों व सरकारों की पहचान बन गई है। हमारी बुद्धि को विदेशी चकाचौंध ने पूर्णतः हर लिया है, फिर भी हमारा भारत आत्मनिर्भर है? अपने देश का इससे अधिक उपहास क्या होगा?
मेरे देशवासियो! क्या आपका आत्मा भी विदेशी दास बन गया है? यदि नहीं, तो आपका आत्मा आपको क्यों नहीं धिक्कारता?
आएँ और हमारा साथ दें, हम आपको वैदिक विज्ञान के द्वारा पूर्ण स्वाधीनता की ओर ले जाने के लिए कृतसंकल्प हैं।
-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक
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