સોમવાર, 15 જુલાઈ, 2013

arya

जय आर्यव्रत जय हिंद 
मानव संसार की तीसरी आंख दिशा बोध सार की 


सोचा न था भारत माता के पांच हजार वर्ष के इतिहास में कितनी भयानक करुना होगी 'शोचा न था वेद विधा  मानव जीवन उन्नति की सुखद कल्याणी धर्म गुण गाह्य हे शाचा न था ईस्वर के पुत्र आर्य गुण में बसते हे '  वही जग में भुलाई ये बात याद कराई ऋषि दयानंद ने दिया संदेश सत्यार्थ प्रकाश  से  भारत इतिहास और वेद  का जगसे हटाओ मिटावो पाखंड अंधविश्वास का पावो धर्म गुण ज्ञान का ईश्वर है क्या आकाश जैसा?आकाश है क्या शब्द जैसा ?शब्द है क्या ज्ञान जैसा ?ज्ञान है क्या इश्वर जैसा इश्वर है मूल ज्ञान स्रोत है इनसे ही न्याय दया प्रेम सत्य का प्रकाश  प्रकाशित होता है। यही अहसासही करना है। महसूस जगमे भुलाई ये बात याद कराइ  ऋषि दयानद ने दिया संदेश सत्यार्थ प्रकाश से भारत इतिहास और वेद का अपरोक्ष ज्ञान हे। ईश्वर का वेद्विधा धर्म पाकर गुण संस्कार,समाज परिवार निर्माण हुवा राज वही संविधान से परोक्षमें  पाता है। सब लाभ इश्वर का यही अहसास ही करना है। महसूस जग में भुलाई ये बात याद कराई ऋषि दयानंद  ने संदेश दिया सत्यार्थ प्रकाश  से भारत इतिहस और वेदका ,अगर होती न तपस्या ऋषीयो की तो कहपाते अक्षर विधा की प्रथम खोज है  ऋषीयो की अगर गुण संस्कार का होता अभाव तो समाज परिवार राज रक्षक कहां होता? मिलती न माता  पिता और राष्ट्र  की छाया केसी होती दारुण दशानारी की माता पुत्री  भगिनी  कहा कहलाती ,पशुवत होता जीवन मानव का केसा किया है। उपकार  ऋषीयो ने नारी करुणा करनी पे यही अहसास करना है। महसूस जग में  भुलाई ये बात याद कराइ ऋषि दयानंद ने दिया संदेश सत्यार्थ प्रकाश  से
भारत इतिहास और वेदका यही संस्कार वेद के प्रकाशित करनेका नाम है। सुवर्ण काल आर्ष ऋषियोका वैदिक कृत मानव जीवन संसारका जब महा भारत युद्ध के बाद विपरीत हुआ परिणाम तब विधवा माताये और बालक केसे बने निराधार वही कल से लुट रहा था संस्कार आर्य जीवनका बदल रही थी करवत भारत इतिहास की चाणक्य ने पुन्ह थोपी नीम वेद गुरुकुल की वह असफल करदी  सिंकदर ने भारत विजेता बनकर सिंकदर लोटा अपने देस परत अपने सैनिकोसे भारतके कई राजके रजा बनाकर राजा वहिबने वह सैनिक कैसे करते राज समाज हितमे उस राजा बनेहुय सेनिकोने बुलाया ग्रीकसे युवओको उसे पढ़कर संस्कृत उसे सोपा विधा केन्द्रकशी बनारस वेद्विधा के शास्त्र उसने अपनी राक्षसी मानस माया से करदी विपरीत वेद्विधा के धर्मगुण विपरीत विषकारी फेलाई जब वेद नामसे अनर्थकारी प्रप्रेक्ष मंत्रो से फेलाया कूड़ा पंथ और वाम मार्ग यही विकृतमे फेलाया कथित कर्मकांड यही अहसास करना है। महसूस जगमे भुलाई ये बात याद कराइ ऋषि दयानंद  ने दिया संदेश सत्यार्थ प्रकाश से भारत इतिहास और वेदका रून विधाके राक्षसी मानस शत्रुने वेद्विधा से विपरीत कथित चलाये विकृत कर्म कांड और हवन में जीवहिंसा ये बात कथित पाई षि चावार्क ने फेलाया तब नास्तिकवाद  कहा वेद इश्वर ये पुरोहित धूर्तो की है सब जाल उसके मानस वंश में हुवा आगमन भगवान बुद्ध के फेलाया अहिंसा परमो धर्म नाम वही विकल्प रहा अंतिम देश कालपात्र स्थान ये बुध्ध के बादमे बोधधर्म के नाम मतरचा सूर्यके अभाव में दीपक ही सही भारत के रजा और भूमंडल के अन्य देशमे भी लगा फेलने बुध्ध्मतसे उन नास्तिक मानवीय कर्नका भयपाया सिकंदरसैनिक राज वंश ने और कथित उनके कर्मकांड पुरोहित वंश ने अब क्या होगा हमारी रावण अनुकरणमि राक्षसी माया का न रहेगा राज हमारा न रहेगा पुरोहित धृतकांडहमारा धृतदंभी तो कही से भी मार्ग अपना खोजलेते है। उस षडयंत्री ओने अपने पूर्वज के आयति इतिहास और वेद्विधा के विपरीत कर्मकांड के इतिहास मिटाने का बुध्ध परक अनुकरण में पृथकनाम से बुध्ध महावीर चोविस अवतार वाद जैनमत रचा फेलायारूप मूर्तिपूजा का वही मायावी अक्षर विधाके सारी और मानसिक विकृति के स्वार्थ पाषने  निद्रोष कन्याको भी धर्मकी आड्मे सध्विका दियापद और अपने आपको सिकंदरी आयतकी छाप मिटने वैदिक शास्त्रोमे जो प्रपेक्ष किया इन इतिहास दबाने जैनशास्त्रमे अपने आपको आर्य सिध्ध करनेका दुसाहस भी किया है यही कारन अंग्रेजोने आर्य भी आयति हे अेसा भ्रम फेलाया था आर्य के सबंध  में जोथी विधावेद्की उसको की गई मिटाई कितनी राक्षसी बुध्धी    से रचाई उसीने जाल केसे इतिहास और वैदिक धर्मगुण के विपरीत परिणाम में केसे नाम अर्याका करना है अपने बसमे यही यहसास ही करना है महसूस जग में भुलाई ये बात याद कराइ ऋषि  दयानंद  ने दिया संदेश    सत्यार्थ प्रकाश  से भारत इतिहास और वेद क सिकंदर के सैनिक ग्रीक के नकली पुरोहित जो वैदिक नामसे कर्मकांड फेलातेथे तक पाकर बोध्ध मतके अनुकरण में जैनमत की रची जाल और भारतीय राज वंशको दिक्षित  लंगे करने पुरे देशमे अगर बनजाता जैन बोध्धमत के अनुजतो न दिखता  पूर्वज ऋषि वेद इतिहास  और न दिखता बोध्ध आगमन कारण पूर्वका राक्षसी कर्मकांड इसे नाथने के विक्लपमे बुध्ध आग्मनाथा देशकाल पात्र स्थान ऐसे ही पाना हे इतिहास में सब को और करना है महसूस गुण के विपरीत कारन की करनी है खोज सबको अेसे ही भारत इतिहास में बुध्ध के उधार पास के कारण जब हुवा आगमन एक सन्यासी शन्कराचार्य  का लगे वह सोचने आस्तिक वेदका छुटाना नास्तिक मतका फैलाना संसार के  लिए उसे बढ़कर हानी क्या हो सकती है। उसे तोडना जैन के उदयकाल में और वेदको पुन:फेलान कैसे संभवकरेवह विकल्पमे अदैत परकरचानवी वेदांत जैसे रहे बोध्ध ;जैनमतकी भेद परक विपरीत कारण वैसेरही वेद और शंकराचार्य की वेदांत भेद परकता लेकिन जो आशय शुध्ध शंकराचार्य के वेद की आस्तिकता को फैलाना और नास्तिकमत को हटाने का था प्रयोजन देश काल पात्र अदैत परक रचामंत्र अहम ब्रहयसिम का और संसार गुमराह से बचाना यही है ब्रह्म सत्य और जगत मिथ्या का दिया बोध्ध शान में जो अपने आपको ब्रहम समर्पित कर कार्य करे ब्रह्या निर्माता का फेलाये प्रकाश वेदका तब ज्ञान विधाके शत्रु अंधकार फैलाने वाले ग्रीक सिंकदरी मानस जिसने कियाथा वेद विधाको गुमराह और वेद नामसे बनकर नकली पुरोहित अपने आपको बचाने बोध्ध अनुकरण में कैसे रचा जैनमतका डेरा वहिसब अँधेरा फेलाने वालोने भय पाया शंकरचार्य का जो जोदेते है अक्षर ब्रह्म के मंत्र वह है किया ?सैर उसे मिटाये कैसे वही षड्यंत्र में नकली शिष्य बनकर पाकर भेद उपदेश अक्षर ब्रह्म का और पिलाकर विष किया प्रयोजन पूरा ग्रीक मानसी विधा के शत्रु ने शंकराचार्य से पाया अदैत उपदेश सारा और पयाभय उपदेश काजो फेलनेसे होता है ज्ञान निज आत्मा के सारा हमने तो सारी वेद इतिहास बुध्ध और इश्वर की बुनियाद मिटादी सरिजो न हमे कोई जान पाये और सता विधा और व्यपार रहै हमारा लेकिन उन शंकराचर्या ऐकअकेले ने किया पानी दिया कार्य कर देहका तो हमने किया नाश किन्तु उस विकल्पी जो अदैत उपदेश फैलागाया तो सब अज्ञानसे  मुक्त हो जायेगे अक्षर विधाका लोप कर दिया जाये लेकिन जो अदैत उपदेश में वह ज्ञान तत्व है जो आत्मा के उसके सामने गोण अक्षर विधाकी भी नही रहती जरूरत जो लिखने पढने से अक्षरज्ञान होता है  ऐसा ज्ञान आत्म तत्व के शंकरचार्य के मानस में किस शक्ति से अदैत विकल्प का बना मानस अब इस अहम ब्रह्म उपदेश को हटाव मिटावे और विपरीत करे कैसे ?पुर्वमे जब कर्मकांड परक हमने नाम लेकर वेदक उसी तरह नाम वेदका और कम हमारा बना ऐसेही नाम शंकराचार्य का रहे और काम हमारे यही षड्यंत्र के विकल्प में उन विधा के शत्रु ओने खोजा उपाय मनुस्मृति के जैसे वेद के नाम से वेद विरुध्ध कर्मकांड रचकर हिसा फैलाई उसी तरह मनुस्मृति के नामच इसके विपरीत कथित जातिवाद रचकर षड्यंत्र कारी भेद में जो कभी देशजाति एक हो न पाए और भाषा का भी किया ऐसा षड्यंत्र कारी निर्माण जो हर प्रांतभाषा भेद ऐसा किया पुरोहित वंशीकरण  में और प्रांतभाषा का किया निर्माण जो अन्य को पढना न जाये और अर्थ के व्यापर करण के जाति वंशवाद में रचा वैश्य करण षड्यंत्र सारा जो फैलाये देश में सारे  अंधकार में गुमराह  करने के षड्यंत्र में शंकराचार्य के  नाम नकली ब्राह्मण परक ग्रंथ रचा सारा वेद विधा और अक्षर विधा पढने पढ़ाने स्त्री शुद्र पे लगाई पाबंधी शंकराचार्य ने जो फैलाया था अदैत ब्रह्म उपदेश इस विकल्प में जो मानव संसार नास्तिक का और कथित पुरोहित मानसकी माया कर्मकांड से बचा ये केसे और वेद क पुन :प्रकाश फैलाना है केसे यही प्रयोजन से कहाथा ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या अथार्त आत्माही ब्रह्म है जीवही ब्रह्म है अपने आपही खुद ब्रह्म है धर्म के कथित रावण स्वरूपी मायावी लोगकी बात से गुमराह होनेसे बचो और बचाओ ऐसे प्रयोजन में देशकाल पात्रके विकल्प में अहम ब्रह्मस्मि का अदैत उपदेश रचने हारा शंकराचार्यजी  के मानस संकुचित केसे हो सकते है इसके नाम जगत मिथ्या अकर्मनिय वेद का स्वरूप देकर गुरुवाद फेलाए गये और उसके नाम कथित स्वार्थ ने स्त्री शुद्रो को विधा पढाई न जाये महापुरुष के साथ वेद और मनु भगवान के  साथ जितना अन्याय हुवा है  अक्षरही ब्रह्म है जो सारे ब्रह्मांड में अकार का व्यापक गुंजार है वही भूल अक्षर का पान करना है आत्मा को भेद न्यारेहे उसी उपदेश सारमे जिवनाम भी अक्षर रहे आत्मा नाम भी अक्षर है इश्वर नाम भी अक्षर रहे जो नाम का कही अभाव ही नही  तो हम क्यों अज्ञान में है गुमराह वही अदैत उपदेश के ये विकल्प को विफल करनेमे सारे शंकराचार्य के प्रकाश के शत्रु ने उसे मिटना और उसीके मानस के गुण को गुमराह स्वरूप देकर मानव संसार पे बड़ा द्रोह किया अन्याय किया किस षड्यंत्र से भेदसार  ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या के अर्थमे उसी का रूप दिया विपरीत कोई लाखोमे होता है इश्वर सत्य खोजी अगर सत्य आसपुरी होगी जिसकितो वह करता है उपकार जगत ये और करता समाज को उजागर तो एसा न हो पाये उसी षड्यंत्र की जाल में सन्यासी के लीएतो जगत है मिथ्या।,मिथ्या जगत ये मोह कैसा उपदेश कैसा जिस ब्रह्मा उपदेश को जिसने पा  लिया तो निवृत ,मोक्ष,भोग और आनंद भी इनके लिये तूच्छ हे ब्रह्मका पान वही विपरीत अर्थ में सन्यासी के उपदेश से समाजको रखा दूर संसार त्याग जब वैराग पावो सन्यासी बनो उपदेश  पावो तब  जाने जगत मिथ्या वही रची कथित परम्परा जो निवृत परक बने अदैतवादी सारे इसके विपरीत कथित जातिवाद रचकर षड्यंत्रकारी भेद में जो कभी देशजाति एक हो न पाए और भाषाका भी किया एसा षड्यंत्र कारी निर्माण जो हर प्रांतभाषा भेद ऐसा किया पुरोहित वंशीकरण में और प्रांतभाषा का किया निर्माण जो अन्य को पढ़ाया न जाये और अर्थ   के व्यापर करण  के जाति वंशवाद में रचा वैश्य करण षड्यंत्र  सारा जो फैलाया देश में सारे अंधकार में गुमराह करने के षड्यंत्र शंकराचार्य के नाम नकली ब्राह्मण परक ग्रन्थ रचा सारा वेद विधा और अक्षर विधा पढने पढ़ाने स्त्री शुद्र पे लगाई पाबंधी शंकराचार्य ने जो फैलायाथा अदैत  ब्रह्म उपदेश इस विकल्प में जो मानव संसार नास्तिक का  कथित पुरोहित मानस की माया कर्मकांड से बचाने केसे और वेदका पुन ; प्रकाश फैलाना है केसे यही प्रयोजन से कहाथा ब्रह्मा सत्य जगत मिथ्या अर्थात आत्माही ब्रह्म है जीवही ब्रह्म है अपने आपही खुद ब्रह्म है धर्मके कथीत रावण स्वरूपी मायावी लोगकी बात से गुमराह होनेसे बचो और बचावो ऐसे प्रयोजन में देशकाल पात्र के विकल्प में अहम ब्रह्यास्मि  का अदैत उपदेश रचने हारा शंकराचार्यजी के मानस संकुचित केसे हो सकते है के इसके नाम जगत मिथ्या अकर्मणीय वेदका स्वरूप देकर गुरुवाद फेलाये गये और उसके नाम कथित स्वार्थ ने स्त्री शुद्रो को विधा पढाई न जाये महापुरुष के साथ वेद और मनु भगवान के साथ जितना अन्याय हुवा है अक्षर ही ब्रह्मा हे जो सारे ब्रह्मांड में अकार का व्यापक गुंजार है वही भूल अक्षर का पान करना है आत्मा को भेद न्यारेहे उसी उपदेश सार में जीवनाम भी अक्षर रहे आत्मा नाम भी अक्षर है इश्वर  नाम भी अक्षर रहे जो नाम का  कही अभाव ही नही तो हम क्यों अज्ञान में है गुमराह वही अदैत उपदेश के ये विकल्प को विफल करनेमे सारे शंकराचार्य के प्रकाश के शत्रुने उसे मिटना और उसीके मानस के गुण को गुमराह स्वरूप देकर मानव संसार पे बड़ा द्रोह किया अन्याय किया किस षड्यंत्र से भेद सार ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या के अर्थ में उसी का रुपदिया विपरीत कोई लाखो में होता है इश्वर सत्य के खोजी अगर सत्य की आसपुरी होगी जिसकितो वह करता है उपकार जगत ये और करता समाज को उजागर तो एसा न हो पाये उसी षड्यंत्र की जाल में   सन्यासी के लिएतो  जगत है मिथ्या ,मिथ्या जगतये मोह केसा उपदेश केसा जिस ब्रह्मा उपदेश को जिसने पालिया तो निवृत मोक्ष ,भोग और आनद भी इनके लिए तुच्छ है ब्रह्मका पान वही विपरीत अर्थ में सन्यासी के उपदेश से समाज को रखादुर संसार त्याग   जब वैराग्य पावो सन्यासी बनो उपदेश पावो तब जाने जगत मिथ्या वही रची कथित परंपरा जो निवृत परक बने अदैतवादी सार युक्तिपूर्ण षड्यंत्र कारी अंधकार फैलाने वालो के लिय   रहाक्या बाकी देश की हिनता पे और अज्ञान में पतन हानि में क्या रहा बाकी धेर लिये देश सारा नाम देकर वेद मन्त्र का अर्थ किया निज स्वार्थका नाम दिया मनुस्मृति का कथित जाति समाज रची अपनी स्वार्थ पुर्तिमे नाम दिया शंकराचार्य का स्वार्थ सिध्ध किया अपने शत्रु ओके हर अच्छे गुणविधा प्रकाशको मिटाकर उसके बाद रचादी साजिस इश्वर अवतारकी अच्छे महापुरुषों के प्रयोजन से विपरीत रची है जालसारी यही इतिहास के भेद को है पाना चरित्र हिन माँ अपने पुत्र को कहेगी केसे तेरे मूल पिता ये है ऐसे ही हर कथित धर्मावलबीओ केसे कहेगे धर्म के मूल सत्य के वही गुण भेद सारे वही इतिहास मानव संसारको पाना है जागना जगाना है अंधकार फैलाने वालोसे बचने बचाने से ही काम नही चलाना है किन्तु उसको केसे लाना है प्रकाश में और उसके दुष्ट्क्रमो को मिटाना है दफन करना है तो ही संसार का कल्याण होगा अन्था कोई विकल्प नही वही करना है अहेसास सारे यही वेद ज्ञान विधा का गुण सार पाया मूल प्रज्ञा चक्षु गुरु विरजानंदनेऔर अपने शिष्य दयानंद से मांगी दक्षिणा वहजो  संसार से अज्ञान ,अंधविश्वास ,अंधकार अविध मिटाने की वही गुरु दक्षिणा के रुपमे गुरुभक्त करुणाकंद महर्षि दयानंद ने दिया महान ग्रन्थ   सत्यार्थ प्रकाश उसी के पढने से ही होता है। महसूस जग में भुलाई जो बात याद कराइ ऋषि  दयानंद ने दिया संदेश सत्यार्थ प्रकाश से भारत इतिहास और वेद का।                                     


               प्रेरक                                               प्रकाशक                                                        लेखक 
  विश्वआर्य समाज परिषद                     राष्ट्रिय जनक्रांति आंदोलन                                   जयंती भाई आर्य 
                                                                                                                               ९६३८१२१२६६ 

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